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Wednesday, October 26, 2011

मेट्रो, मर्द और महिलाएं

नोयडा सेक्टर १६ में जैसे ही मेट्रो में सवार हुआ, एक भाईसाहब बेहद झल्लाए खड़े मिले। उनके आसपास दो- तीन श्रोता नुमा भाव- भंगिमा वाले लोग थे। भाई साहब इसलिए नाराज़ थे क्योंकि किसी मोहतरमा ने उन्हें मेट्रो में `महिलाओं वाली सीट' से उठा दिया था। भीड़ थी और भाई साहब को दूर जाना होगा इसलिए झल्लाहट की तीव्रता रिएक्टर स्केल पर बहुत ज्यादा मापी गई थी। सुनिए, झल्लाहट भरे संवाद में हास्य प्रहसन।

भाई साहबः इन औरतों का तो बस... चमक- दमक के आएंगी और कहीं भी किसी भी बैठे हुए को ऐसे उठा देंगी जैसे मेट्रो सिर्फ उनके लिए ही चलाई गई हो और मर्द किसी बेटिकट मुसाफिर की तरह इधर उधर चेहरा छिपाता हुआ फिरा करता है।


श्रोता (उनके बॉडी लेंग्वेज से साफ था या फिर वो भी किसी मोहतरमा का शिकार होकर सीट से हटाए गए लगते थे... इसलिए भाई साहब के साथ उनका भी साझा दुख था)- भाई साहब, इनके लिए तो बोगी भी अलग कर रखी है मेट्रो वालों ने ...फिर भी इन्हें चैन नहीं पड़ता...


भाई साहब (आग में घी डालने का तुरंत असर पड़ा)- भैय्या इनके लिए बोगी अलग है... ऊपर से तमाम बोगियों में दो- दो तीन सीटें महिलाओं के नाम है... फिर भी इनके लिए कम पड़ती है... भाई साहब ये तो बस ट्रेन में दाखिल हुई तो सामने वाली सीट पर बैठे मर्दों पर जैसे मुसीबत आ गई... मान लो, लुगाई की नज़र सामने वाली सीट पर बैठे मर्दों पर नहीं पड़ी तो उसकी अगली सीट पर बैठे मर्दों का चेहरा जर्द हो जाता है कि पता नहीं ये कब उनकी तरफ ताक दे...


श्रोता (भाई साहब की भाव भंगिमा के साथ की गई उनकी संपूर्ण प्रस्तुति पर तमाम श्रोता हो- हो कर हंसने लगे)- यही कहा, इन लुगाइयों को तो जैसे ही ये ट्रेन में सवार हुई तुरंत के तुंरत सीट चाहिए ही चाहिए... नहीं तो अमीन सयानी की आवाज में बार- बार जो महिलाओं के लिए सीट खाली करने का आदेश नुमा आग्रह किया जाता है, इसे सुन- सुनकर लुगाइयां मर्दों को ऐसी जली निगाह से देखती हैं कि आंखों से ही पी जाएगी अभी के अभी।


भाई साहब (भाई साहब का रंग जम चुका था। उनकी भाव- भंगिमा के साथ की गई प्रस्तुतियों पर दाद दी जा रही थी... इसलिए शुरू में झल्लाए पड़े भाई साहब अब उत्साह में थे)- अब ये जींस में आएंगी और आपके सामने खड़ी हो जाएंगी... अब ये आप पर है कि आपमें शर्म है या नहीं। नहीं है तो उनकी जलती निगाहों के बाद भी बैठे रहिये। अमीन सयानी के बार- बार आग्रह (धमकियों) के बाद भी सीट न छोड़ें... इसके बाद भी लोगों को चैन नहीं पड़ता... जींस वालियों के पक्ष में जैसे पूरी बोगी में सहानुभूति लहर सी चल पड़ती है... सबका निशाना होता है वो शख़्स जो उस जींस वाली के सामने सीट पर बेशर्मी से बैठा पड़ा है... इसलिए जींस वाली को लेकर सबकी सहानुभूति उसी बेचारे पर टूटती है... जींस वाली के सबसे नजदीकी बैठे हुए मर्द को उठाने के लिए वहां खड़े लोग तो निगाहों ही निगाहों में इशारा तो करते ही हैं, उसी सीट पर किनारे बैठे लोग भी बेचारे को उठने का इशारा करने लगते हैं...


(तमाम बातें भाई साहब ने किसी माहिर रंगकर्मी की तरह कही, जिससे श्रोता हों या फिर अबतक निरपेक्ष बैठे -खड़े अ- श्रोता भी हो- हो कर हंस पड़े... हां, कई जींस वाली कन्याएं और उनकी मां नुमा महिलाएं भी अपनी हंसी नहीं रोक पाईं)

Sunday, June 26, 2011

हम मुकद्दर के चुकंदर

मुकद्दर का सिकंदर फिल्म का नाम है। मुकद्दर का सिकंदर मुहावरा है। मुकद्दर का सिकंदर नज़ीर है। लेकिन मुकद्दर का सिकंदर हक़ीक़त भी है। सिकंदर एक हुआ लेकिन बहुतेरे ऐसे हुए जो मुकद्दर के बल पर सिकंदर बने। ऐसे सिकंदर जब चलते हैं तो बैकग्राउंड से आवाज़ आती रहती है सिकंदर- सिकंदर। इन सिकंदरों के हाथ अगर मोटरसाइकिल लग जाए तो फिर क्या कहने- उनकी अदाएं ऐसी होती हैं जैसे बैकग्राउंड में कोई हाहाकारी गीत बज रहा हो। अगर आप भी इस श्रेणी में आते हों तो आपको बताना क्या, आपको तो इसका अहसास भी होगा।
इन सिकंदरों पर मां- बाप लट्टू होकर कहते रहे हैं कि सिकंदर न सही, मुकद्दर का सिकंदर तो है। अधेड़ावस्था को कबके पार कर चुके शर्मा जी ऐसे ही मुकद्दर के सिकंदर हैं, जिन्हें इस उम्र में भी 18 साल की खूबसूरत पत्नी मिलने का सौभाग्य हासिल हुआ। यह सब हुआ महज एक दिन में। मुहल्ले भर के लिए सिरदर्द बनी शर्मा जी की पहली और असली पत्नी लड़ते- झगड़ते ज़िंदगी के मैदान में खेत रहीं। तब शर्मा जी ने अट्ठारह और बीस साल के अपने दो बच्चों को पालने के नाम पर अट्ठारह साल की एक ख़ूबसूरत ग़रीब कन्या का उद्धार कर दिया। शर्मा जी के नाते- रिश्तेदार कहते हैं कि अपने शर्मा जी मुकद्दर के सिकंदर हैं। शर्मा जी भी सुनकर ऐसे ख़ुश होते हैं जैसे छुछंदर मट्ठे का स्वाद लेकर खुश होता है। लेकिन पूरे मोहल्ले में यह रहस्य अबतक है कि मुकद्दर के सिकंदर शर्मा जी हैं या फिर उनके दोनों हट्ठे- कट्ठे बेटे। मुहल्ले भर की नज़रें दोनों नौजवानों के लालन- पालन पर लगी हुई हैं।
पूरा मोहल्ला मुकद्दर के सिकंदरों से भरा पड़ा है। गुप्ता जी दफ़्तर में मुकद्दर के सिकंदर हैं तो सिंह साहब दौलत के मामले में मुकद्दर के सिकंदर हैं। हां, मोहल्ले भर में अकेला मेरा घर है जहां मैं मुकद्दर का सिकंदर नहीं हूं। यह नहीं कहूंगा कि मैने कोशिश नहीं की। मुझपर भी मुकद्दर का सिकंदर बनने के दौरे पड़ते थे। दफ़्तर से लेकर घर तक हर जतन करके देख लिया। मुकद्दर के सामने बहुत रिरियाया- घिघियाया। लेकिन जिस तरह महिलाओं के लिए ससुराल गेंदा फूल रहा है, उसी तरह मेरे लिए मुकद्दर गूलर का फूल रहा है। मुझमें सिकंदर बनने का कोई गुण बचपन से लेकर आजतक न देखा या पाया गया इसलिये बन भी नहीं पाया। हां, जतन करते- करते मैं मुकद्दर का चुकंदर जरूर बन गया। तमाम जगहों पर मुकद्दर का चुकंदर के रूप में मेरी पहचान है। घर से लेकर दफ़्तर तक। अपने बाल- बच्चों से लेकर पड़ोसनों तक। मित्रों से लेकर विरोधियों तक। हर जगह। विरोधी तो पीठ पीछे कहते हैं लेकिन मित्र मुंह पर कह जाते हैं। दफ़्तर में चपरासी से लेकर बॉस तक मुझे चुकंदर बाबू के रूप में याद करते हैं। घर में तो ख़ैर, मेरे पहुंचते ही इसी उद्घोषणा के साथ मेरा स्वागत होता है। वही चुकंदर जिसका जूस पीकर लोग सेहत बनाते हैं लेकिन मुर्ग- मसल्लम तोड़ते हुए यह भी कहते हैं कि -
`यार, इस चुकंदर- फुकंदर का स्वाद बड़ा छुछंदरनुमा होता है। अब गुण है तो स्वाद और लुक भी तो ठीक- ठाक कर लो। छूछे गुण का क्या करना है भैय्या!' लेकिन न चुकंदर बदला न ही हम बदले। इसलिए तमाम जान- पहचान और जाने- अनजाने मुकद्दर के सिकंदरों से जलते- भुनते मैं यह शपथपूर्वक घोषणा करता हूं कि ख़ाकसार वाकई मुकद्दर का चुकंदर है।

Sunday, May 8, 2011

यहाँ इतना सन्नाटा क्यों है मेरे भाई उर्फ़ रिंगटोन नामा

रिंग टोन और कॉलर ट्यून का अपना अलग -अलग मिजाज होता है। रिंग टोन खुद के लिए होता है जबकि कॉलर ट्यून आपके लिए होता है। रिंग टोन आमतौर पर आप ऐसे चुनते हैं जो आपको पसंद हो। कॉलर ट्यून आप ऐसा चुनते हैं जो आप कॉल करने वालों को सुनना चाहते हों। लेकिन दोनों का ही अपना -अपना व्याकरण है जो आपके पूरे व्यक्तित्व को ज़माने के सामने लाता है। मसलन, मेरे मोबाइल पर इक़बाल का लिखा- लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी, ज़िंदगी शमां की सूरत हो ख़ुदाया मेरी। कॉलर ट्यून लगा नहीं रखा है। लेकिन मेरे कई मित्र हैं जिन्होंने कॉलर ट्यून के रूप में अलग- अलग गीत- गाने लगा रखे हैं... लेकिन सबसे पहला उदाहरण जो बेहद दिलचस्प है। मेरे एक मित्र हैं राकेश राय, हम दोनों में पुरानी मित्रता है लेकिन इधर चार- महीने से उन्हें फोन नहीं कर पाया और न ही उनका फोन आया। ज़िंदगी दोनों की चलती रही लेकिन शायद उन्होंने वीतराग में आकर कॉलर ट्यून लगाया- चांद न बदलता, सूरज न बदला, न बदला भगवान, कितना बदल गया इंसान। ...जब फोन किया तो उन्होंने ठठाते हुए कहा कि इतने- इतने दिनों में खोज- खबर लोगे तो ऐसे ही जले- जले गीत सुनाऊंगा।...लेकिन मजाक छोड़ दें तो यह रिंग टोन के रूप में आपकी पसंद जो है सो आपके व्यक्तित्व की पहचान बन जाती है। मसलन एक मित्र ने कॉलर ट्यून लगा रखा है- राधे- राधे राधे बरसाने वाली राधे। काफी धार्मिक प्रवृत्ति के हैं इसलिये उनकी पसंद में भी इसकी झलक मिलती है। एक छिछोरे मित्र हैं इसलिये उन्होंने कॉलर ट्यून लगा रखा है- डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। एक और छिछोरे भाईसाहब हैं जिनका रिंग टोन है- झूम बराबर झूम शराबी, काली घटना है मस्त फिजा है, जाम उठाकर झूम- झूम झूम। गीत -गाने ही नहीं, धुनों में भी इसकी झलक मिलती है। जैसे फास्ट म्युजिक वाले रिंग टोन नये लड़कों के लिए। जबकि आहिस्ता- आहिस्ता कानों में उतरने वाला धुन अधेड़ पसंद करते हैं। लड़कियां और महिलाएं ज्यादातर कॉलर ट्यून लगाने से परहेज करती हैं क्योंकि उन्हें फोन करने वाला पता नहीं किस भ्रम में कब पड़ जाए। मेरी जानकारी में कुछेक साल पहले लगा कहीं रहा था लेकिन फोन कहीं लग गया। फोन किसी महिला ने उठाया और रॉंग नंबर कहकर काट भी दिया लेकिन उससे पहले जो कॉलर ट्यून था वह सुनिये-हुजूर आते- आते बहुत देर कर दी, नसीबा मेरे तूने बीमार-ए-ग़म की दवा लाते- लाते बहुत देर कर दी। मेरी उस महिला को लेकर यही राय बनी कि कोई दिलफुंकी टाइप की चीज़ होंगी। दिलचस्प बात यह है कि लड़के अक्सर बिना कॉलर ट्यून के फोन ही नहीं रखते। उनपर बजने वाले गीत- गानों को सुनकर तो ऐसा लगता है कि हर वक़्त वह किसी- न -किसी को भरमाने के चक्कर में रहते हैं।..चक्कर में पड़ गई तो पड़ गई नहीं तो राधे- राधे।

Monday, March 28, 2011

कौन डकार रहा है ग़रीबों का निवाला


लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष रामविलास पासवान ने राज्यसभा में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार योजना को लेकर सवाल पूछा था। सरकार की तरफ़ से इसका जवाब दिया गया। जिसमें बताया गया कि अलग- अलग वित्तीय वर्ष में मनरेगा में बिहार सरकार को कितनी राशि दी गई और कितनी राशि ख़र्च नहीं की गई। राज्य सरकार की तरफ से ख़र्च नहीं होने वाली राशि करोड़ों में है। ग़रीब मजदूरों को रोज़गार की गारंटी देने वाली इकलौती योजना के पांच साल पूरे होने के बाद इसका सूरत-ए-हाल जानना और भी ज़रूरी है। 2 फरवरी 2006 को डॉ.मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए- वन की सरकार ने आंध्र प्रदेश के अनंतपुर से इस योजना की शुरुआत की थी। संसद ने 25 अगस्त 2005 को कामगारों को रोज़गार की गारंटी देने वाले प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। एक लंबी लड़ाई के बाद इस योजना के जरिये मजदूरों को पहली बार रोज़गार का उनका हक़ दिये जाने की शुरुआत की गई। सौ दिनों के काम की गारंटी देने वाली इस योजना में मजदूरों को शुरू में 65 रुपये रोज़ाना दिया जाता था। जो अब सौ रुपये रोजाना दिया जा रहा है। वित्तीय वर्ष 2007- 2008 में इस योजना का विस्तार देश के 130 जिलों तक हुआ। अलग- अलग चरणों में देश के 625 जिलों में इस योजना को लागू किया गया। मनरेगा, यूपीए सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजना रही है। इस योजना के लिए लगातार बढ़ते फंड से इसे समझा जा सकता है। 2006- 2007 में योजना की शुरुआत के समय भारत सरकार की तरफ से 11300 करोड़ की राशि आवंटित की गई। यानी, तक़रीबन 2.5 बिलियन। 2007- 2008 में यह राशि 2.6 बिलियन, 2008- 2009 में यह राशि 6.6 बिलियन और 2010- 2011 में 8.91 बिलियन की राशि आवंटित की गई। ग़ौर करें तो 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले डॉ.मनमोहन सिंह की सरकार ने मनरेगा की धनराशि की अप्रत्याशित बढ़ोतरी की। यूपीए सरकार की सत्ता में दोबारा वापसी के पीछे इस योजना का अहम किरदार बताया जाता है। इस योजना ने भले ही सरकार बनाई हो लेकिन ग़रीबों की तक़दीर फिर भी नहीं बदल पाई। इस योजना के क्रियान्वयन पर बड़े सवाल उठते रहे हैं। भ्रष्टाचार में शामिल संगठित तंत्र, ग़रीबों के हक़ को भी अपना निवाला बना रहा है। इस योजना में सौ दिनों के रोज़गार की गारंटी दी जाती है जो केवल ख़ुशफ़हमी भर है। इस मामले में अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मणिपुर और मिजोरम जैसे राज्यों की तस्वीर और भी ख़राब है, जहां इस योजना में सौ दिनों का रोज़गार नहीं मिला। इसके साथ ही फर्ज़ी मस्टर रोल और फर्जी बिल के जरिये भुगतान करा लेने, समय पर मजदूरी नहीं मिलने या फिर तय मजदूरी नहीं मिलने की शिकायतें ज्यादातर राज्यों में पाई गई हैं। सरकारी आकड़ा कहता है कि पिछले तीन साल में इस योजना के तहत 1331 शिकायतें सरकार की जानकारी में आई हैं। जिनमें सबसे ज्यादा 419 शिकायतें उत्तर प्रदेश, 235 शिकायतें मध्य प्रदेश, 180 शिकायतें राजस्थान, 125 शिकायतें बिहार और 87 शिकायतें झारखंड से मिली हैं। इस योजना में सामाजिक अंकेक्षण या सोशल ऑडिट की व्यवस्था है। अनिवार्य सोशल ऑडिट के लिए पैनल गठित किये जाने की व्यवस्था है जिसमें पंचायत के सभी ख़ास- ओ- आम को शामिल किया जाना था। जिला स्तर पर बनने वाली निगरानी समिति का अध्यक्ष इलाके के सांसदों को बनाया गया है। लेकिन यूपीए वन की सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री रहे रघुवंश प्रसाद सिंह का कहना है कि, `योजना की निगरानी व्यवस्था का हाल बेहद ख़राब है। बिहार जैसे राज्य में किसी पंचायत में योजना का सामाजिक अंकेक्षण नहीं किया गया। जबकि ग्राम सभा की बैठकें अनिवार्य रूप से होनी चाहिये। जिसमें मनरेगा के क्रियान्वयन के बारे में सबको पूरी जानकारी दी जानी चाहिये। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में सोशल ऑडिट की व्यवस्था अच्छी है लेकिन उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों में सोशल ऑडिट की व्यवस्था व्यवहार में नहीं है। जबकि निगरानी, पारदर्शिता, भागीदारी और जवाबदेही मनरेगा जैसी योजना के सफल होने के मंत्र हैं।' रघुवंश प्रसाद सिंह के ग्रामीण विकास मंत्री रहते मनरेगा की शुरुआत हुई थी। दरअसल, मनरेगा का क्रियान्वयन राज्य और केंद्र सरकार के संबंधों पर भी काफी कुछ निर्भर करता है। बिहार और उत्तर प्रदेश का उदाहरण सामने है। मनरेगा को लेकर राज्यसभा में सरकार की तरफ से दिये गए जवाब में बताया गया है कि वित्तीय वर्ष 2007- 2008 में बिहार सरकार को मनरेगा में 1523 करोड़ आवंटित किये गए जिसमें 1052 करोड़ ख़र्च हुए और 471 करोड़ ख़र्च नहीं किये गए। वित्तीय वर्ष 2008- 2009 में बिहार सरकार को मनरेगा में 2187 करोड़ आवंटित किये गए जिसमें 1316 करोड़ ख़र्च हुए 871 करोड़ ख़र्च नहीं किये गए। 2009- 2010 में बिहार सरकार को 2358 करोड़ दिये गए जिसमें 1816 करोड़ ख़र्च हुए और 541 करोड़ ख़र्च नहीं हुए। समझा जा सकता है कि केंद्र सरकार पर वित्तीय असहयोग करने का आरोप लगाने वाली बिहार सरकार मनरेगा के फंड का पूरा इस्तेमाल तक नहीं कर पाई। जबकि गुजरात, हरियाणा, पंजाब जैसे विकसित राज्य मनरेगा में मिली राशि का पूरा इस्तेमाल कर रहे हैं। ग़रीब और ग़रीबी, सियासत के लिए पसंदीदा विषय रहे हैं। इसलिये ग़रीबों की ग़रीबी दूर करने वाली योजना- मनरेगा में भी सियासत के रंग गहरे हैं। लेकिन सवाल यही है कि क्या राजनीति का यह रवैया योजना से ज्यादा योजना के हक़दारों के साथ खुला खिलवाड़ नहीं है? आख़िरकार कौन है जो ग़रीबों के निवाले को भी डकार रहा है? क्योंकि मनरेगा में हाथों को काम नहीं मिल रहा है। काम मिल रहा है तो तय मजदूरी नहीं मिल रही है। फंड है लेकिन इस्तेमाल नहीं हो रहा है। क्या महंगाई के साथ- साथ भ्रष्टाचार डायन ग़रीबों को खाए जा रही है।

Tuesday, February 1, 2011

आजकल किसका झोला ढो रहे हैं आप?

कल मेट्रो स्टेशन पर आसपास नज़रें दौड़ाई तो बड़ा दिलचस्प योग मैने निकाला। 28 में से 22 के कंधे पर बैग था। वही पिट्ठू बैग। यह बैग मेरी निगाह में नहीं आता लेकिन मुंबई पर हमला करने वाले आतंकी कसाब के कंधे पर भी कुछ ऐसा ही बैग था। इस तरह के बैग को लेकर कोई आकर्षण नहीं है क्योंकि पीठ पर जब इस बैग को टांग लिया जाता है तो आपके ठीक पीछे खड़े होने वाले के लिए यह तक़लीफ़देह है।
ख़ैर, हर दौर का अपना झोला हुआ करता है, जिसे आजकल बैग कहा जाता है। मुझे याद है कि समाजवाद के झोले का अपना अर्थ हुआ करता था। सर्वोदयी झोला उसी दौर में आया। खादी के खुरदुरे कपड़ों वाला झोला। कांधे पर लटकाने वाला। कई पीढ़ियां यही झोला टांगती रही। उस दौर में यह भी फैशन था कि झोले में भले कुछ न हो, यानी झोला खाली भी रहे तो कोई बात नहीं लेकिन लटकाए रखो। चलन में था उन दिनों। ननिहाल में मेरे मामा इसी तरह का झोला लटकाते थे। इमर्जेंसी के दिनों में तो यह झोला गैर कांग्रेसवाद व्यक्तित्व का हिस्सा माना जाता था। तमाम खादी भंडारों में इस तरह का झोला बिका करता था। खादी के पाजामा- कुर्ते के साथ यही झोला तब की नौजवान पीढ़ी के कंधे पर देखा जाता था।
इस तरह का झोला ढोते- ढोते जब यह पीढ़ी बुढ़ा गई तो एक नये किस्म का बैग चलन में आया। सिंथेटिक कपड़ों में ठीक ढोलक के आकार का बैग हुआ करता था जिसे कांधे पर सीधा टांगा जाता था। उसमें प्लास्टिक की पतली रस्सी लगी होती थी। इस बैग की बनावट ऐसी थी कि आप कपड़ों को तह करके ठीक ढंग से रख नहीं सकते थे। यानी, ठूंस- ठूंसकर इसमें कपड़े भरे जाते और जब उन्हें बाहर निकाला जाता था तो वे तुड़ी-मुड़ी हालत में होते थे। कई बार कॉलेजों में भी इसी बैग में किताबें लेकर स्टूडेंट पहुंचते।
उसके बाद सूटकेस का चलन भी काफी दिनों तक रहा। पतले किस्म के सूटकेस और उसमें एकाधा कपड़ों के साथ कुछ दूसरी चीजें। सूटकेस इतना छोटा हुआ करता था कि दूसरे किसी सामान की गुंजाईश ही नहीं होती थी। लेकिन सुविधाजनक भी काफी होता था। कामकाजी लोगों के बीच इस तरह के सूटकेस का खासा चलन था। इसी बीच चमड़े के हैंड बैग का चलन भी लंबे अरसे तक रहा। छोटे से बैग में लोग अपनी जरूरत भर का सामान लेकर उंगलियों के बीच ख़ास अंदाज़ में उसे फंसाकर चलते थे।
लेकिन काफी दिनों तक बैग का चलन स्थगित रहने के बाद फिर तब लोगों के कंधे पर बैग देखा गया जब लैपटॉप का ज़माना आया। ज्यादातर कंधों पर लैपटॉप वाला बैग देखा जाने लगा। भले ही इस बैग में लैपटॉप न भी हो, लोगों को भरमाने के लिये इस बैग का इस्तेमाल देखा गया। ख़ूबसूरत आकार वाले चमड़ों के बैग। लेकिन यह बैग भी धीरे- धीरे ग़ायब होता जा रहा है। अब लोगों के कंधे पर पिट्ठू बैग देखा जा रहा है। शुरुआत में यह पिट्ठू बैग बेहद छोटे आकार का हुआ करता था और ख़ासकर लड़कियां इस तरह के बैग टांगती देखी गई। आगे चलकर लड़कों के लिए बड़े आकार वाले पिट्ठू बैग धड़ल्ले से चल रही है। यानी, यह मौजूदा पीढ़ी का बैग है। आप टांगना चाहेंगे?