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Tuesday, February 1, 2011

आजकल किसका झोला ढो रहे हैं आप?

कल मेट्रो स्टेशन पर आसपास नज़रें दौड़ाई तो बड़ा दिलचस्प योग मैने निकाला। 28 में से 22 के कंधे पर बैग था। वही पिट्ठू बैग। यह बैग मेरी निगाह में नहीं आता लेकिन मुंबई पर हमला करने वाले आतंकी कसाब के कंधे पर भी कुछ ऐसा ही बैग था। इस तरह के बैग को लेकर कोई आकर्षण नहीं है क्योंकि पीठ पर जब इस बैग को टांग लिया जाता है तो आपके ठीक पीछे खड़े होने वाले के लिए यह तक़लीफ़देह है।
ख़ैर, हर दौर का अपना झोला हुआ करता है, जिसे आजकल बैग कहा जाता है। मुझे याद है कि समाजवाद के झोले का अपना अर्थ हुआ करता था। सर्वोदयी झोला उसी दौर में आया। खादी के खुरदुरे कपड़ों वाला झोला। कांधे पर लटकाने वाला। कई पीढ़ियां यही झोला टांगती रही। उस दौर में यह भी फैशन था कि झोले में भले कुछ न हो, यानी झोला खाली भी रहे तो कोई बात नहीं लेकिन लटकाए रखो। चलन में था उन दिनों। ननिहाल में मेरे मामा इसी तरह का झोला लटकाते थे। इमर्जेंसी के दिनों में तो यह झोला गैर कांग्रेसवाद व्यक्तित्व का हिस्सा माना जाता था। तमाम खादी भंडारों में इस तरह का झोला बिका करता था। खादी के पाजामा- कुर्ते के साथ यही झोला तब की नौजवान पीढ़ी के कंधे पर देखा जाता था।
इस तरह का झोला ढोते- ढोते जब यह पीढ़ी बुढ़ा गई तो एक नये किस्म का बैग चलन में आया। सिंथेटिक कपड़ों में ठीक ढोलक के आकार का बैग हुआ करता था जिसे कांधे पर सीधा टांगा जाता था। उसमें प्लास्टिक की पतली रस्सी लगी होती थी। इस बैग की बनावट ऐसी थी कि आप कपड़ों को तह करके ठीक ढंग से रख नहीं सकते थे। यानी, ठूंस- ठूंसकर इसमें कपड़े भरे जाते और जब उन्हें बाहर निकाला जाता था तो वे तुड़ी-मुड़ी हालत में होते थे। कई बार कॉलेजों में भी इसी बैग में किताबें लेकर स्टूडेंट पहुंचते।
उसके बाद सूटकेस का चलन भी काफी दिनों तक रहा। पतले किस्म के सूटकेस और उसमें एकाधा कपड़ों के साथ कुछ दूसरी चीजें। सूटकेस इतना छोटा हुआ करता था कि दूसरे किसी सामान की गुंजाईश ही नहीं होती थी। लेकिन सुविधाजनक भी काफी होता था। कामकाजी लोगों के बीच इस तरह के सूटकेस का खासा चलन था। इसी बीच चमड़े के हैंड बैग का चलन भी लंबे अरसे तक रहा। छोटे से बैग में लोग अपनी जरूरत भर का सामान लेकर उंगलियों के बीच ख़ास अंदाज़ में उसे फंसाकर चलते थे।
लेकिन काफी दिनों तक बैग का चलन स्थगित रहने के बाद फिर तब लोगों के कंधे पर बैग देखा गया जब लैपटॉप का ज़माना आया। ज्यादातर कंधों पर लैपटॉप वाला बैग देखा जाने लगा। भले ही इस बैग में लैपटॉप न भी हो, लोगों को भरमाने के लिये इस बैग का इस्तेमाल देखा गया। ख़ूबसूरत आकार वाले चमड़ों के बैग। लेकिन यह बैग भी धीरे- धीरे ग़ायब होता जा रहा है। अब लोगों के कंधे पर पिट्ठू बैग देखा जा रहा है। शुरुआत में यह पिट्ठू बैग बेहद छोटे आकार का हुआ करता था और ख़ासकर लड़कियां इस तरह के बैग टांगती देखी गई। आगे चलकर लड़कों के लिए बड़े आकार वाले पिट्ठू बैग धड़ल्ले से चल रही है। यानी, यह मौजूदा पीढ़ी का बैग है। आप टांगना चाहेंगे?

2 comments:

Meet..... said...

संजीव भईया ।

सादर प्रणाम...
बैग और झोले का तो गज्जब का वर्णन किया है आपने सर जी । इसे नजरिया ही तो कहेगें जो बैग और झोले जैसी निर्जिव सी प्रतीत होने वाली चीजों की ऐसी व्याख्या हुयी जान पड़ता है एक ड्राक्यूमेंट्री देख के उठा हूं कोई डिस्कवरी टाईप की । खैर आपको काफी नजदीक से जानता हूं । आपके उस विद्रोही तेवर से भी यदा कदा वाकिफ हूं और आपके उस साइलेंट किलर टाइप की पर्सनालिटी से भी ।

बैग में थोडा उस बैग का भी वर्णन किजिये जिसमें फिरौती की रकम पहुचाई जाती थी । अभिषेक के पापा अरे अपने लंबू भईया की फिल्मो में (डॉन इत्यादि)ने बाल मन पर अच्छा प्रभाव डाला है । और उसमें सूटकेस, ब्रीफकेस और बैगस् का अच्छा रोल है ।


शेष कुशल है

विश्व कप में आपके राजदुलारे सचिन अच्छा खेलें इन्ही शुभेच्छाओं के साथ साधुवाद.।

आपका
अमित

और हां नीरज भईया को प्रणाम सप्लाई कर दिजियेगा थोड़ा सा

संजीव said...

दोस्त, कहां हो भाई आजकल?