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Monday, March 28, 2011

कौन डकार रहा है ग़रीबों का निवाला


लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष रामविलास पासवान ने राज्यसभा में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार योजना को लेकर सवाल पूछा था। सरकार की तरफ़ से इसका जवाब दिया गया। जिसमें बताया गया कि अलग- अलग वित्तीय वर्ष में मनरेगा में बिहार सरकार को कितनी राशि दी गई और कितनी राशि ख़र्च नहीं की गई। राज्य सरकार की तरफ से ख़र्च नहीं होने वाली राशि करोड़ों में है। ग़रीब मजदूरों को रोज़गार की गारंटी देने वाली इकलौती योजना के पांच साल पूरे होने के बाद इसका सूरत-ए-हाल जानना और भी ज़रूरी है। 2 फरवरी 2006 को डॉ.मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए- वन की सरकार ने आंध्र प्रदेश के अनंतपुर से इस योजना की शुरुआत की थी। संसद ने 25 अगस्त 2005 को कामगारों को रोज़गार की गारंटी देने वाले प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। एक लंबी लड़ाई के बाद इस योजना के जरिये मजदूरों को पहली बार रोज़गार का उनका हक़ दिये जाने की शुरुआत की गई। सौ दिनों के काम की गारंटी देने वाली इस योजना में मजदूरों को शुरू में 65 रुपये रोज़ाना दिया जाता था। जो अब सौ रुपये रोजाना दिया जा रहा है। वित्तीय वर्ष 2007- 2008 में इस योजना का विस्तार देश के 130 जिलों तक हुआ। अलग- अलग चरणों में देश के 625 जिलों में इस योजना को लागू किया गया। मनरेगा, यूपीए सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजना रही है। इस योजना के लिए लगातार बढ़ते फंड से इसे समझा जा सकता है। 2006- 2007 में योजना की शुरुआत के समय भारत सरकार की तरफ से 11300 करोड़ की राशि आवंटित की गई। यानी, तक़रीबन 2.5 बिलियन। 2007- 2008 में यह राशि 2.6 बिलियन, 2008- 2009 में यह राशि 6.6 बिलियन और 2010- 2011 में 8.91 बिलियन की राशि आवंटित की गई। ग़ौर करें तो 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले डॉ.मनमोहन सिंह की सरकार ने मनरेगा की धनराशि की अप्रत्याशित बढ़ोतरी की। यूपीए सरकार की सत्ता में दोबारा वापसी के पीछे इस योजना का अहम किरदार बताया जाता है। इस योजना ने भले ही सरकार बनाई हो लेकिन ग़रीबों की तक़दीर फिर भी नहीं बदल पाई। इस योजना के क्रियान्वयन पर बड़े सवाल उठते रहे हैं। भ्रष्टाचार में शामिल संगठित तंत्र, ग़रीबों के हक़ को भी अपना निवाला बना रहा है। इस योजना में सौ दिनों के रोज़गार की गारंटी दी जाती है जो केवल ख़ुशफ़हमी भर है। इस मामले में अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मणिपुर और मिजोरम जैसे राज्यों की तस्वीर और भी ख़राब है, जहां इस योजना में सौ दिनों का रोज़गार नहीं मिला। इसके साथ ही फर्ज़ी मस्टर रोल और फर्जी बिल के जरिये भुगतान करा लेने, समय पर मजदूरी नहीं मिलने या फिर तय मजदूरी नहीं मिलने की शिकायतें ज्यादातर राज्यों में पाई गई हैं। सरकारी आकड़ा कहता है कि पिछले तीन साल में इस योजना के तहत 1331 शिकायतें सरकार की जानकारी में आई हैं। जिनमें सबसे ज्यादा 419 शिकायतें उत्तर प्रदेश, 235 शिकायतें मध्य प्रदेश, 180 शिकायतें राजस्थान, 125 शिकायतें बिहार और 87 शिकायतें झारखंड से मिली हैं। इस योजना में सामाजिक अंकेक्षण या सोशल ऑडिट की व्यवस्था है। अनिवार्य सोशल ऑडिट के लिए पैनल गठित किये जाने की व्यवस्था है जिसमें पंचायत के सभी ख़ास- ओ- आम को शामिल किया जाना था। जिला स्तर पर बनने वाली निगरानी समिति का अध्यक्ष इलाके के सांसदों को बनाया गया है। लेकिन यूपीए वन की सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री रहे रघुवंश प्रसाद सिंह का कहना है कि, `योजना की निगरानी व्यवस्था का हाल बेहद ख़राब है। बिहार जैसे राज्य में किसी पंचायत में योजना का सामाजिक अंकेक्षण नहीं किया गया। जबकि ग्राम सभा की बैठकें अनिवार्य रूप से होनी चाहिये। जिसमें मनरेगा के क्रियान्वयन के बारे में सबको पूरी जानकारी दी जानी चाहिये। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में सोशल ऑडिट की व्यवस्था अच्छी है लेकिन उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों में सोशल ऑडिट की व्यवस्था व्यवहार में नहीं है। जबकि निगरानी, पारदर्शिता, भागीदारी और जवाबदेही मनरेगा जैसी योजना के सफल होने के मंत्र हैं।' रघुवंश प्रसाद सिंह के ग्रामीण विकास मंत्री रहते मनरेगा की शुरुआत हुई थी। दरअसल, मनरेगा का क्रियान्वयन राज्य और केंद्र सरकार के संबंधों पर भी काफी कुछ निर्भर करता है। बिहार और उत्तर प्रदेश का उदाहरण सामने है। मनरेगा को लेकर राज्यसभा में सरकार की तरफ से दिये गए जवाब में बताया गया है कि वित्तीय वर्ष 2007- 2008 में बिहार सरकार को मनरेगा में 1523 करोड़ आवंटित किये गए जिसमें 1052 करोड़ ख़र्च हुए और 471 करोड़ ख़र्च नहीं किये गए। वित्तीय वर्ष 2008- 2009 में बिहार सरकार को मनरेगा में 2187 करोड़ आवंटित किये गए जिसमें 1316 करोड़ ख़र्च हुए 871 करोड़ ख़र्च नहीं किये गए। 2009- 2010 में बिहार सरकार को 2358 करोड़ दिये गए जिसमें 1816 करोड़ ख़र्च हुए और 541 करोड़ ख़र्च नहीं हुए। समझा जा सकता है कि केंद्र सरकार पर वित्तीय असहयोग करने का आरोप लगाने वाली बिहार सरकार मनरेगा के फंड का पूरा इस्तेमाल तक नहीं कर पाई। जबकि गुजरात, हरियाणा, पंजाब जैसे विकसित राज्य मनरेगा में मिली राशि का पूरा इस्तेमाल कर रहे हैं। ग़रीब और ग़रीबी, सियासत के लिए पसंदीदा विषय रहे हैं। इसलिये ग़रीबों की ग़रीबी दूर करने वाली योजना- मनरेगा में भी सियासत के रंग गहरे हैं। लेकिन सवाल यही है कि क्या राजनीति का यह रवैया योजना से ज्यादा योजना के हक़दारों के साथ खुला खिलवाड़ नहीं है? आख़िरकार कौन है जो ग़रीबों के निवाले को भी डकार रहा है? क्योंकि मनरेगा में हाथों को काम नहीं मिल रहा है। काम मिल रहा है तो तय मजदूरी नहीं मिल रही है। फंड है लेकिन इस्तेमाल नहीं हो रहा है। क्या महंगाई के साथ- साथ भ्रष्टाचार डायन ग़रीबों को खाए जा रही है।