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Sunday, June 26, 2011

हम मुकद्दर के चुकंदर

मुकद्दर का सिकंदर फिल्म का नाम है। मुकद्दर का सिकंदर मुहावरा है। मुकद्दर का सिकंदर नज़ीर है। लेकिन मुकद्दर का सिकंदर हक़ीक़त भी है। सिकंदर एक हुआ लेकिन बहुतेरे ऐसे हुए जो मुकद्दर के बल पर सिकंदर बने। ऐसे सिकंदर जब चलते हैं तो बैकग्राउंड से आवाज़ आती रहती है सिकंदर- सिकंदर। इन सिकंदरों के हाथ अगर मोटरसाइकिल लग जाए तो फिर क्या कहने- उनकी अदाएं ऐसी होती हैं जैसे बैकग्राउंड में कोई हाहाकारी गीत बज रहा हो। अगर आप भी इस श्रेणी में आते हों तो आपको बताना क्या, आपको तो इसका अहसास भी होगा।
इन सिकंदरों पर मां- बाप लट्टू होकर कहते रहे हैं कि सिकंदर न सही, मुकद्दर का सिकंदर तो है। अधेड़ावस्था को कबके पार कर चुके शर्मा जी ऐसे ही मुकद्दर के सिकंदर हैं, जिन्हें इस उम्र में भी 18 साल की खूबसूरत पत्नी मिलने का सौभाग्य हासिल हुआ। यह सब हुआ महज एक दिन में। मुहल्ले भर के लिए सिरदर्द बनी शर्मा जी की पहली और असली पत्नी लड़ते- झगड़ते ज़िंदगी के मैदान में खेत रहीं। तब शर्मा जी ने अट्ठारह और बीस साल के अपने दो बच्चों को पालने के नाम पर अट्ठारह साल की एक ख़ूबसूरत ग़रीब कन्या का उद्धार कर दिया। शर्मा जी के नाते- रिश्तेदार कहते हैं कि अपने शर्मा जी मुकद्दर के सिकंदर हैं। शर्मा जी भी सुनकर ऐसे ख़ुश होते हैं जैसे छुछंदर मट्ठे का स्वाद लेकर खुश होता है। लेकिन पूरे मोहल्ले में यह रहस्य अबतक है कि मुकद्दर के सिकंदर शर्मा जी हैं या फिर उनके दोनों हट्ठे- कट्ठे बेटे। मुहल्ले भर की नज़रें दोनों नौजवानों के लालन- पालन पर लगी हुई हैं।
पूरा मोहल्ला मुकद्दर के सिकंदरों से भरा पड़ा है। गुप्ता जी दफ़्तर में मुकद्दर के सिकंदर हैं तो सिंह साहब दौलत के मामले में मुकद्दर के सिकंदर हैं। हां, मोहल्ले भर में अकेला मेरा घर है जहां मैं मुकद्दर का सिकंदर नहीं हूं। यह नहीं कहूंगा कि मैने कोशिश नहीं की। मुझपर भी मुकद्दर का सिकंदर बनने के दौरे पड़ते थे। दफ़्तर से लेकर घर तक हर जतन करके देख लिया। मुकद्दर के सामने बहुत रिरियाया- घिघियाया। लेकिन जिस तरह महिलाओं के लिए ससुराल गेंदा फूल रहा है, उसी तरह मेरे लिए मुकद्दर गूलर का फूल रहा है। मुझमें सिकंदर बनने का कोई गुण बचपन से लेकर आजतक न देखा या पाया गया इसलिये बन भी नहीं पाया। हां, जतन करते- करते मैं मुकद्दर का चुकंदर जरूर बन गया। तमाम जगहों पर मुकद्दर का चुकंदर के रूप में मेरी पहचान है। घर से लेकर दफ़्तर तक। अपने बाल- बच्चों से लेकर पड़ोसनों तक। मित्रों से लेकर विरोधियों तक। हर जगह। विरोधी तो पीठ पीछे कहते हैं लेकिन मित्र मुंह पर कह जाते हैं। दफ़्तर में चपरासी से लेकर बॉस तक मुझे चुकंदर बाबू के रूप में याद करते हैं। घर में तो ख़ैर, मेरे पहुंचते ही इसी उद्घोषणा के साथ मेरा स्वागत होता है। वही चुकंदर जिसका जूस पीकर लोग सेहत बनाते हैं लेकिन मुर्ग- मसल्लम तोड़ते हुए यह भी कहते हैं कि -
`यार, इस चुकंदर- फुकंदर का स्वाद बड़ा छुछंदरनुमा होता है। अब गुण है तो स्वाद और लुक भी तो ठीक- ठाक कर लो। छूछे गुण का क्या करना है भैय्या!' लेकिन न चुकंदर बदला न ही हम बदले। इसलिए तमाम जान- पहचान और जाने- अनजाने मुकद्दर के सिकंदरों से जलते- भुनते मैं यह शपथपूर्वक घोषणा करता हूं कि ख़ाकसार वाकई मुकद्दर का चुकंदर है।