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Wednesday, October 26, 2011

मेट्रो, मर्द और महिलाएं

नोयडा सेक्टर १६ में जैसे ही मेट्रो में सवार हुआ, एक भाईसाहब बेहद झल्लाए खड़े मिले। उनके आसपास दो- तीन श्रोता नुमा भाव- भंगिमा वाले लोग थे। भाई साहब इसलिए नाराज़ थे क्योंकि किसी मोहतरमा ने उन्हें मेट्रो में `महिलाओं वाली सीट' से उठा दिया था। भीड़ थी और भाई साहब को दूर जाना होगा इसलिए झल्लाहट की तीव्रता रिएक्टर स्केल पर बहुत ज्यादा मापी गई थी। सुनिए, झल्लाहट भरे संवाद में हास्य प्रहसन।

भाई साहबः इन औरतों का तो बस... चमक- दमक के आएंगी और कहीं भी किसी भी बैठे हुए को ऐसे उठा देंगी जैसे मेट्रो सिर्फ उनके लिए ही चलाई गई हो और मर्द किसी बेटिकट मुसाफिर की तरह इधर उधर चेहरा छिपाता हुआ फिरा करता है।


श्रोता (उनके बॉडी लेंग्वेज से साफ था या फिर वो भी किसी मोहतरमा का शिकार होकर सीट से हटाए गए लगते थे... इसलिए भाई साहब के साथ उनका भी साझा दुख था)- भाई साहब, इनके लिए तो बोगी भी अलग कर रखी है मेट्रो वालों ने ...फिर भी इन्हें चैन नहीं पड़ता...


भाई साहब (आग में घी डालने का तुरंत असर पड़ा)- भैय्या इनके लिए बोगी अलग है... ऊपर से तमाम बोगियों में दो- दो तीन सीटें महिलाओं के नाम है... फिर भी इनके लिए कम पड़ती है... भाई साहब ये तो बस ट्रेन में दाखिल हुई तो सामने वाली सीट पर बैठे मर्दों पर जैसे मुसीबत आ गई... मान लो, लुगाई की नज़र सामने वाली सीट पर बैठे मर्दों पर नहीं पड़ी तो उसकी अगली सीट पर बैठे मर्दों का चेहरा जर्द हो जाता है कि पता नहीं ये कब उनकी तरफ ताक दे...


श्रोता (भाई साहब की भाव भंगिमा के साथ की गई उनकी संपूर्ण प्रस्तुति पर तमाम श्रोता हो- हो कर हंसने लगे)- यही कहा, इन लुगाइयों को तो जैसे ही ये ट्रेन में सवार हुई तुरंत के तुंरत सीट चाहिए ही चाहिए... नहीं तो अमीन सयानी की आवाज में बार- बार जो महिलाओं के लिए सीट खाली करने का आदेश नुमा आग्रह किया जाता है, इसे सुन- सुनकर लुगाइयां मर्दों को ऐसी जली निगाह से देखती हैं कि आंखों से ही पी जाएगी अभी के अभी।


भाई साहब (भाई साहब का रंग जम चुका था। उनकी भाव- भंगिमा के साथ की गई प्रस्तुतियों पर दाद दी जा रही थी... इसलिए शुरू में झल्लाए पड़े भाई साहब अब उत्साह में थे)- अब ये जींस में आएंगी और आपके सामने खड़ी हो जाएंगी... अब ये आप पर है कि आपमें शर्म है या नहीं। नहीं है तो उनकी जलती निगाहों के बाद भी बैठे रहिये। अमीन सयानी के बार- बार आग्रह (धमकियों) के बाद भी सीट न छोड़ें... इसके बाद भी लोगों को चैन नहीं पड़ता... जींस वालियों के पक्ष में जैसे पूरी बोगी में सहानुभूति लहर सी चल पड़ती है... सबका निशाना होता है वो शख़्स जो उस जींस वाली के सामने सीट पर बेशर्मी से बैठा पड़ा है... इसलिए जींस वाली को लेकर सबकी सहानुभूति उसी बेचारे पर टूटती है... जींस वाली के सबसे नजदीकी बैठे हुए मर्द को उठाने के लिए वहां खड़े लोग तो निगाहों ही निगाहों में इशारा तो करते ही हैं, उसी सीट पर किनारे बैठे लोग भी बेचारे को उठने का इशारा करने लगते हैं...


(तमाम बातें भाई साहब ने किसी माहिर रंगकर्मी की तरह कही, जिससे श्रोता हों या फिर अबतक निरपेक्ष बैठे -खड़े अ- श्रोता भी हो- हो कर हंस पड़े... हां, कई जींस वाली कन्याएं और उनकी मां नुमा महिलाएं भी अपनी हंसी नहीं रोक पाईं)

1 comment:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपको और आपके पूरे परिवार को दीपावली की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!