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Thursday, January 3, 2013

अतुल जी और अमर उजाला की नौकरी

आज सुबह- सुबह आदत के मुताबिक `अमर उजाला’ खोला तो अचानक मुख्य पृष्ठ पर अतुल भाईसाहब की तस्वीर के साथ उनके पुण्यतिथि की तारीख सामने थी। संयोग देखिए कि यही मेरा जन्मदिन भी है यानी 3 जनवरी।

अतुल जी का जब निधन हुआ था तो इसकी सूचना किसी न्यूज़ पोर्टल पर देखी थी (याद नहीं कहां देखी थी)... लेकिन उसे देखकर भी जैसे आंखों को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ये अतुल भाईसाहब के बारे में है। उनके तमाम चाहने वालों की तरह उस वक़्त विश्वास करना मुश्किल था कि भाईसाहब नहीं रहे। इन दो वर्षों के बाद आज सुबह जब उनकी पुण्यतिथि को याद दिलाती तस्वीर देखी तो आंखें शायद पूरी अभ्यस्त हो चुकी हैं और पुरनम आंखों में उनसे जुड़ी कुछेक ऐसी यादें और तस्वीरें आकर ठहर गई जिनमें उनका पूरा व्यक्तित्व गढ़ा था।

अमर उजाला के मेरठ संस्करण में मैं बतौर ट्रेनी नियुक्त किया गया था। पहले दो हजार और बाद में बढ़कर ढाई हजार की तनख्वाह। मेरे छोटे भाई नीरज भी इसी पद पर थे। इससे पहले कभी मेरठ जाना तो दूर उसके बारे में कुछ ऐसा ही सुना था जैसे हम सुनते आए थे कि अलीगढ़ के ताले मशहूर होते हैं ...उसी तरह मेरठ की कैंची जबर्दस्त होती है।

ख़ैर! उस वक़्त के संपादक श्री रामेश्वर पांडेजी ने हम दोनों का इंटरव्यू और लिखित परीक्षा लेकर भाईसाहब से शायद उसे फाइनल करवाने के लिए गए... लौटकर उन्होंने कहा कि तुम दोनों कल से काम शुरू कर दो। दो-चार दिन बाद मुझे बताया गया कि भाईसाहब ने बुलाया है। मैं और नीरज दोनों ही गए... उनके चैम्बर में कुछेक देर की बातचीत हुई। उन्होंने पूछा कि कहां के रहने वाले हो और यहां कहां रह रहे हो।.. सबकुछ बताया।

उसके बाद मैं और नीरज, दोनों सिटी रिपोर्टिंग में आए। हमारे इंचार्ज थे श्री राजेंद्र त्रिपाठी। जमकर काम होता रहा। करीब 7 महीने बीत गए। शायद अगस्त का महीना था। मेरी छोटी बहन की शादी बिहार में तय हो गई थी- पिताजी ने फोन से इसकी सूचना दी थी। पिताजी से बातचीत में अंदाज़ा हुआ कि शायद पिताजी को तुरंत कुछ पैसों की जरूरत है। मैने भी आव देखा ना ताव, कह दिया कि मैं एक लाख रुपये का इंतज़ाम कर लूंगा। पिताजी हैरान भी हुए कि ट्रेनी रहते हुए मैं कहां से इंतज़ाम करूंगा। बगल में फोन सुन रहे नीरज को भी झटका लगा क्योंकि उसे पता था कि पैसे हैं नहीं तो हम यहां कहां से इंतज़ाम कर लेंगे। उसने मुझे कुछ झिड़कते हुए ये भी कहा कि तुरंत पिताजी को बता दिया जाए कि वो इंतजाम नहीं कर पाएंगे क्योंकि अभी तो वक़्त है, बाद में इंतजाम करना उनके लिए भी बहुत बड़ी मुसीबत हो जाएगी। ऊपर से बहन की शादी की बात थी इसलिए नीरज ने जोखिम लेना उचित नहीं समझा।... मैं भी सन्नाटे में कि बोल तो दिया लेकिन इंतज़ाम आखिर हो कहां से? हम दोनों भाइयों ने बहन की शादी के लिए अपनी तरफ से कुछ बचत करना शुरू कर दिया था। मेरी तनख्वाह में दोनों भाई खाने और रहने का इंतजाम करते और नीरज की तनख्वाह बैंक में बहन की शादी के नाम पर छोड़ दी जाती। लेकिन ये रकम भी बामुश्किल 30 हजार के आसपास थी और सवाल एक लाख का था।...

रात भर हम दोनों भाइयों को नींद नहीं आई... सुबह किसी ने सलाह दी कि भाईसाहब ऐसे मामलों में मदद तो करते हैं लेकिन हम दोनों ही ट्रेनी हैं इसलिए वो भी कितना मदद करेंगे ये कहा नहीं जा सकता। लिहाजा, हमने अपने इंचार्ज त्रिपाठी जी से ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि वो तो कुछ नहीं कर सकते लेकिन भाईसाहब से इसके बारे में कहने पर शायद कुछ मदद कर दें। हमने अतुल भाईसाहब से मिलने का फ़ैसला किया।

यक़ीन मानिए। अंदर से हालत इतनी खराब हो रही थी कि उनके चैम्बर तक पहुंचने से पहले ही लौट जाने की इच्छा हुई। ये भी लगा कि मांगने पर अगर मना कर दें तो और भी दुर्गति होगी। लेकिन एकबार जब समय ले लिया था तो उनके सामने हाज़िर होने की मजबूरी थी। हम दोनों उनके कमरे के सामने जाकर खड़े हुए तो उन्होंने इशारा कर बुलाया और सामने बैठने का इशारा किया। ... वे कुछ काम निबटा रहे थे। कुछ देर की चुप्पी की बात बोले। घबराहट में हमने बोल दिया कि बहन की शादी है और मुझे पैसे तत्काल चाहिए। उन्होंने पूछा कितने की जरूरत है तो मैने कहा कि 50- 60 हजार में काम चल जाएगा। ये भी कह दिया कि दोनों भाई हर महीने हजार-हजार रुपये की किस्तों पर लोन चुकता कर देंगे। मगर आप सोचिए कि एक ट्रेनी जिसकी तनख्वाह दो हजार रुपये है वो अपने मालिक से 50-60 हजार का लोन मांगते हुए कैसा दिखता होगा?.. सोचकर देखिए और जो भी छवि आपके जेहन में बनती हो, मेरी शक्ल वैसी ही हो गई थी।

मगर अतुलजी ने सामने टंगी घड़ी की तरफ देखी.. शायद रात साढ़े आठ या आठ बज रहे होंगे। उनके चेहरे पर कुछ असमंजस का भाव आया तो लगा कि बेकार उनसे पैसे की बात कह दी। मगर कुछ क्षणों के बाद ही भाईसाहब ने कहा कि अकाउंट वाले तो अब चले गए होंगे... कल अगर 12 बजे तक अगर चेक मिल जाए तो कोई परेशानी तो नहीं होगी?... हम दोनों भाई खुशी के मारे सन्नाटे में आ गए। कानों को विश्वास नहीं हो रहा था कि लोन मंजूर हो चुका है। हमने कहा कि आज तो खैर क्या और क्या तो क्या... सप्ताह भर बाद भी हो तो भी कोई दिक्कत नहीं। हमारी ये खुशी इसलिए कम थी कि अतुलजी ने हमारा लोन मंजूर कर लिया है बल्कि खुशी इसबात की दोहरी थी कि एक ट्रेनी पर एक मालिक और संपादक ने जरूरत से ज्यादा भरोसा दिखा दिखाया था। ये एक तरह से मेरी साख पर मुहर जैसी थी।

ख़ैर हम दूसरे दिन 12 बजे दिन में दफ़्तर पहुंचे और गेट पर ही टाइम ऑफिस हुआ करता था। वहां एक लिफाफा हमें दिया गया। लिफाफा खोलकर देखा तो उसमें 60 हजार का चेक था!!... सही मानिए, मेरी आंखें भीग आई। मैने तत्काल बैंक में बचे हुए रुपये और उस चेक को दिल्ली में अपने चाचा के पास पहुंचा दिया, जहां से मेरे घर तक वक़्त से पहले ही पूरी रकम पहुंच गई।

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ये अतुल जी के व्यक्तित्व का वो बेशकीमती हिस्सा था जो शायद बहुत कम मालिकों में देखने को मिलता है। अब मैं आपको अतुलजी से जुड़ी एक और याद सुनाता हूं जो अखबार के मालिक के तौर पर उनके व्यक्तित्व को समझने में मदद करेगी।

हुआ ये था कि मेरे नाम पर एक कार्यक्रम लगाया गया था... बेहद फालतू किस्म का कार्यक्रम था और इसलिए मुझ जैसे ट्रेनी के नाम उसे डाल दिया गया था। कार्यक्रम था विकलांगों में ट्राइसाइकिल बांटने का। एक निजी संस्था का ये कार्यक्रम था और उसमें उस वक़्त के डीएम मुख्य अतिथि थे। यहां ये बताना जरूरी है कि इस संस्था के अहम पदाधिकारी अतुल भाईसाहब के पुराने परिचितों में से भी थे। खैर, भीषण गर्मी में पसीना पोंछता हुआ जब मैं वहां पहुंचा तो गेट पर कुछ विकलांगों की शिकायत थी कि उनसे ट्राइसाइकिल के बदले पैसे मांगे जा रहे हैं। बाद में संजय अग्रवाल के आने पर आयोजकों और जिला प्रशासन के अधिकारियों में इसी बात को लेकर काफी गर्मागर्मी हो गई।

लब्बोलुबाव ये कि संस्था के कामकाज पर सवाल उठाए गए। हालांकि संस्था के जो पदाधिकारी, भाईसाहब के परिचित थे उन्होंने पत्रकारों के सामने ये जाहिर करने की कोशिश की कि ये सब कुछ भी नहीं है बस अधिकारियों के अपने ईगो का मामला है। शाम को ऑफिरस आकर अपने इंचार्ज श्री राजेंद्र त्रिपाठी जी को इसके बताया। इसी बीच कांच की दीवार के बार दिखा कि उसी संस्था के तमाम पदाधिकारी गाड़ी से हमारे दफ्तर आए और भाईसाहब के कमरे की तरफ बढ़ गए।

करीब 15 मिनट बाद पहले त्रिपाठी जी को भाईसाहब ने बुलवाया और बाद में मुझे। सामने भाईसाहब थे और उनके सामने की कुर्सियों पर वही सारे लोग जो संस्था के पदाधिकारी थे। सामने एक खाली कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए अतुलजी ने पूछा कि कार्यक्रम में क्या हुआ था?... मैं सामने बैठे लोगों से बिना डरे और भाईसाहब से उनके संबंधों का ख़याल किए बिना पूरा घटनाक्रम बता दिया। पूरी बात सुनने के बाद भाईसाहब ने मुझे जाने को कह दिया। बाद में आए हमारे इंचार्ज त्रिपाठी ने मुझे कहा कि ख़बर ठीक ढंग से ही जाएगी। मैंने भी अच्छी तरह से खबर तानकर लिख दी। अब खबर के प्लेसमेंट को लेकर मुझे काफी उत्सुकता थी और यही सोचते हुए बड़ी देर तक रात में नींद नहीं आई... तड़के जब जगा तो उस समय तक अख़बार नहीं आया था। इंतज़ार करने लगा और पौ फटने के बाद जब अखबार आया तो अमर उजाला के पिछले पेज पर 5 कॉलम में पूरी ख़बर, बिना काट-पीट के चस्पां थी। उस वक़्त अमर उजाला का पिछला पृष्ठ ही लोकल सिटी के मुख्य पृष्ठ हुआ करते थे।... यानी, अतुलजी ने अपने संबंधों को दरकिनार कर खबर को तरजीह दी थी।

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